Wednesday, 21 February 2018

भारतीय जनता को रहना होगा तैयार

कहने को तो हमारा देश आजाद है लेकिन आजादी उन तबकों तक ही सीमित है जो अपने आप को भारत का सिरमौर मानते जिनके एक इशारे पर जनता क्या राजनेता भी नतमस्तक हो जाते हैं जिनके लिए लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल दी जाती है। लेकिन सवाल यह कि ये व्यवस्थायें उन चंद लोगों के लिए क्यों बदल जाती हैं जो वह कहते उसको सुनकर हमारे हुकमरान नतमस्तक हो कर क्यों हां में हां मिलाते हैं क्यों उनके लिए नए दरवाजें खोलते हैं।
कुछ वर्ष पहले तक भारत देश में राजनेता घोटाले बाज थे पर अब हमारे व्यापारी देश के कर्णधार देश को लूट कर देश में  फरार हो रहें हैं इस में सबसे पहला नाम तो विजय माल्या का आता है जो हमारे भारत की बैंकों को 11000 करोड़ को चूना लगा कर विदेशी धरती पर भारत की खून पसीने की कमाई को लूटा रहा है जिसका न तो वो हिसाब दे सकता है और न ही हमारी सरकार उस से ंिहसाब मांगने की स्थिति में नजर आती है लगातार हो रही किवायतों के बाद भी विजय माल्या किसी भी न्यूज चैनल पर भारत की जनता और भारत की बैंक प्रणाली पर उंगली उठाता नजर आता र्है जिसे देख कर आम जनता का खून तो खोलता है लेकिन सरकार में बैठे नुमांइदें क्यों कोई प्रतिक्रिया नहीं देते, लगातार इस तरह के गमन, घोटाले सरकार के सामने आ रहें हैं फिर भी सरकार उन घोटालों की धुरी तक नहीं पंहुच पाई  क्या उसकी वाणिज्य प्रणाली में सेंध लग गई है, और उनकी सूचनात्मक प्रतिक्रिया भी खत्म हो सी गई। जिसका एक ताजा उदाहरण कुछ दिन पहले ही आया है नीरव मोदी के रूप में, नीरव मोदी पेशे से तो हीरा व्यापारी है लेकिन संपर्क सूत्र इसके बहुत उंचे हैं तभी यह सुर्खियों में छाया हुआ है जिस तरह हजारों करोड़ का लोन भारतीय बैंकों ने विजय माल्या हो दिया था उसी कड़ी में नीरव मोदी भी जुड़ गया है जिसको 110000 करोड़ तो नहीं बल्कि 33000 करोड़ का लोन पास किया गया है जिसको लेकर वह विदेश भाग गया है। लेकिन अब सवाल यह उठता यह है कि बैंको को 11000 करोड़ के घोटाले से नसीहत सही ढंग से प्राप्त नहीं हुई थी जिसका प्रणाम है वर्तमान में ताजा 33000 करोड़ का घोटाला जिससे बैंको की स्पष्ट रूप से लापरवाही देखी जा सकती है।
वहीं अगर हम भारतीय गरीब जनता और किसानों की बात करें तो बैंको की प्रणाली साफतौर पर आदेश देती है कि जितना कर्ज लिया है उसका 12 प्रतिशत की दर से ब्याज देना अनिवार्य है लेकिन वो कौन से मामले जिनमें व्यापारी वर्ग को ये करोड़ों का कर्ज दे देते हैं, और उनसे इनकी मांगने की हिम्मत तक नहीं होती। वहीं दूसरी ओर भारतीय गरीब जनता की जमीन जायदाद तक कब्जा कर लेते हैं जिनका आर्थिक बोझ इतना ज्यादा होता है कि उसके तले दब कर गरीब आत्मदाह तक कर लेता हैं लेकिन बैंकों की कार्य प्रणाली जस की तस काम करती है और उसके जाने के बाद भी उसके परिवार से उस कर्ज की पाई पाई वसूलती है जो उस परिवार के लिए बहुत ही कष्टदायक होता है। लेकिन इस तरह कर्ज वसूली यह उन लोगों पर नहीं करते जो हजारों-करोड़ का कर्ज लेकर देश से फरार हो जाते हैं और विदेश में बैठ कर भारतीय बैंकों को धमकाते हैं कि अगर ‘‘हिम्मत है तो हमसे कर्ज लेकर दिखायें’’ यह शब्द भारत के उस बड़े व्यापारी के हैं जो इस समय देश का हजारों करोड़ का कर्ज लेकर देश से फरार है और हमारे बैंक बस हाथ पर हाथ रख कर प्रशासन की ओर देख रहें हैं और हमारे देश के नेता एक दूसरे पर ही किचड़ उछाल रहें हैं कि किस की सरकार में नीरव मोदी ने कर्ज लेना प्रारंभ किया था जो बहुत ही शर्मनाक है।
इसका सीधा अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि यदि नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे देश के गद्दार व्यापारियों ने अपने हिस्से की रकम बैंको को अदा नही की तो बैंक वह रकम हमारे उपर टैक्स लगाकर या अन्य ओर कोई कर लगाकर भारतीय जनता से ही वसूलेगी जो पुराने जामने की कर व्यवस्था का ही अंग होगी जिसके लिए भारतीय जनता को तैयार रहना होगा। जिस तरह के हालात है उस तरह से तो अनुमान यही लगाया जा सकता है कि सरकार नीरव मोदी और विजय माल्या को देश में लाने में सक्षम नहीं है और नाहिं हमारे बैंक इतना बोझ उठाने में सक्षम जिसकी भरपाई वो हम लोगों पर ‘‘कर’’ लगा कर ही करने वाली है।

                                                                                                         -Sohan Singh

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