Thursday, 9 January 2014

सावित्री बाई फूले का संघर्ष, भूल गया समाज ।

नारी समाज को शिक्षा के लिए प्रेरित करने वाली और उनके अधिकारों के लिए लड्ने वाली पहली महिला सवित्री बाई फूले जो दलित समाज की महिलाओं की प्रेरणा स्रोत है उनका जन्‍म दिवस गत 3 जनवरी को आता है लेकिन उनको कम ही लोग याद करते है और उनके इस योगदान को सिर्फ उनके समाज की महिलाओं और पुरूषों तक ही स‍ीमित रहना पढ रहा है क्‍योंकि वो दलित समाज से थी और वर्तमान में,दलित समाज के युवक-युवती को शोषित नजरों से देखा जाता है भले ही वो कितने भी समझदार क्‍यों न हों कितने भी पढे लिखें क्‍यों न हो पं‍रतू उन्‍हें वो सम्‍मान प्राप्‍त नहीं होता जो सवर्ण समाज के पुरूष और महिलाओं को प्राप्‍त होता है इसी ध्‍येय को याद करते हुए 150 वर्ष पहले के इतिहास पर नजर डालते है जब सवित्री बाई फूले और उनके पति ज्‍योति बा फूले ने शिक्षा को अपना हथियार बनाया और सवित्री बाई फूले ने समाज में अति दलित और दलित समाज की महिलाओं और बच्‍चों को शिक्षित करना आंरभ किया तो सवर्ण समाज ने उनके इस कदम की निन्‍दा की और समाज में महिलाओं की शिक्षा के खिलाफत में मोर्चा खोल दिया
जिससे उस समय की नीतियों को महिला समाज समझ रहा था जो एक इतिहास बनने जा रहा था लेकिन सवित्री बाई दलित समाज से होने के कारण सर्वण समाज में अपना स्‍थान नही बन पाई और सर्वण समाज ने गेहरा एतराज जताया कि एक दलित महिला जिसको समाज में बोलने का अधिकार तक नहीं वो महिला समाज को जाग्रत करने की बात कर रही है जो उस समय समाज के ठेकेदारो को पच नहीं रहा था लेकिन फिर सवित्री बाई फूले और ज्‍योतिबा फूले ने समाज कि परवाह किए बिगेर अपना कार्य किया और उस समय कि समाज में व्‍याप्‍त बुराईयों जैसे कि बाल-विवाह,दहेज प्रथा,बे-मेल विवाह को शिक्षा के माध्‍यम से बदलने कि कोशिश कि और महिलाओं की शिक्षा पर ध्‍यान दिया
सवित्री बाई फूले ने 1849 में पूना में उस्‍मान शेख के घर पर मुस्लिम स्त्रियों और बच्‍चों के लिए पाठशाला खोली और उनके पहली पाठशाला में ही इतनी संख्‍या में छात्राए हो गई कि उन्‍हें एक अध्‍यापक कि नियुक्ति की आवश्‍यकता हो गई जिसमें विष्‍णु पंत थते ने मानवता के नाते मुफत में उन्‍हें पढना स्‍वीकार किया
लेकिन सवित्री बाई फूले यहीं नहीं रूकी उन्‍हें समाज में व्‍याप्‍त उन बुराइयों के प्रति अपना कडृक रूख अपनाया और 1852 में महिला मंडल का गठन किया जिसका मात्र एक ध्‍येय था नारी समाज पर हो रहे अत्‍याचार के खिलाफ मोर्चा बंदी करना । जिसमें उन्‍होने बाल विवाह, बे-मेल विवाह , दहेज प्रथा और सत्‍ती प्रथा के खिलाफ अपना अक्रोश आंदोलन के माध्‍यम से प्रकट किया ।जिससे समाज में स्‍त्री की दशा और दिशा सुधरी जिससे स्‍त्री समाज का पथ सुनिश्चित हुआ कि समाज में अब के पथ में वे किस ओर जाना चाहती है
लेकिन इन सब के बावजूद भी उन सर्वण महिलाओं व पुरूषों को इनके इस योगदान का पता नहीं क्‍योंकि यहां पर सर्वण समाज का अधिकार है
3 जनवरी का दिन सही मंयनो में सर्व शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए । लेकिन इस दिन के बारे में सर्वण समाज को शायद ही पता हो ।लेकिन इस दिन को दलित स्‍त्री-पुरूष समाज बढें सम्‍मान के साथ मनाता है लेकिन सर्वण समाज इस दिन को क्रांति सूर्य सावित्री बाई फूले के नाम पर न बनाकर सर्वपल्‍ली राधा कृष्‍णन के नाम पर मनाते है कहीं न कही सवर्ण समाज, आज भी दलित समाज का शोषण करता दिखता है

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