Sunday, 12 January 2014

अरविन्द केजरीवाल की पार्टी (आप ) का असर

वर्तमान में दिल्ली का गढ जीतने वाले अरविन्द केजरीवाल को आज सभी पार्टीयां और पूरे भारत की जनता पसन्द कर रही है क्योंकि वो एक साधारण व्यक्तित्व वाला एक आम आदमी है जो उसी गरीव समाज से है जो रिश्‍वत जैसी कृति का सताया हुआ अपने मुल्यवान मुल्यों को कभी न भूलने वाला, देश का आम नागरिक बन कर उभरा है जिसने सता के गलियारों में अपनी गूंज का ढोल बजा दिया जिससे सुनकर बढे 2 दिग्गज रण में हार गए । और जो इसकी गूंज को समझ रहे है वो इसके साथ हो चले है देष को बदलने के लिए, अब समय ही तय करेगा कि केजरीवाल के साथ ये जो लोग जुड रहे है सहीं में राश्ट्र हित के लिए जुड रहे है कि स्वंय के हित के लिए जुड रहे है इनका फेसला तो आने वाला समय करेगा कि कहां तक ये सफल होते है और कितना बदलाव ये भारत समाज में लाते है जो एक चुनौती भरा काम है। जहां हर विभाग में एक रिश्‍वत खोर अधिकारी का राज है और तो छोटे बाबू से लेकर बडे बाबू तक सभी बेईमान और निकम्मे है जिन्हें हराम कि खाने कि आदत है। जिनका साथ सरकार दे रही है जो इन सबकी जिम्मेदार है
    इसके बावजूद भी हमें नहीं भूलना चाहिए कि केजरीवाल आम आदमी का प्रतिबिंब बन कर उभरे है और आम आदमी को इस आम आदमी ने प्रभावित किया जो एक अच्छी स्थिति का परिचायक है और बदलाव कि आंधी के आने के संकेत है जिसकी आहट से हर राजनैतिक पार्टी में दहशत का महौल गर्म है जिसकी आहट केजरीवाल की पार्टी ‘आप’ ने दस्तक रूप में दी है जो कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टीयों के लिए पेगाम है कि आम आदमी अब आपको चुनेगा तभी,जब तुम आम जनता के हित में सोचोगे, नहीं तो हमारे पास तीसरे मोर्चे का ऑपशन है इस सुगबुगाहट को काग्रेस और बीजेपी जैसी बडी पार्टीयां समझ गई है और अपने मतदाताओं को लुभाने में लग गई है  तभी वो अब आत्म मंथन शिविर लगा रही है और अपनी हार का कारण खोज रहीं है कि कहां हम से चुक हो गई । लेकिन ये हास्यस्पद है कि इतनी बडी पार्टीयों को ये तक नहीं पता कि उनकी रणनीतियां में कमी और नेताओं के बडबोलेपन ने ही उनको राज्य सभा के चुनावों के नतीजे उनके विपक्ष में दिये और अब मंथन जैसे पांखड का सहार लेकर आम जनता कि मेहनत की कमाई से मंथन शिवरों का अनावरण कर रहीं है और इसका अतिरिक्त कर जनता के उपर कर के रूप में फूटेगा, जिसका सीधा असर आम जन पर होगा और वे ही इसकी बलि चढेगे।
लेकिन ये तो होना ही है कि आमजन भला कैसे न पिसे उसे सताने और कंगाल करने में राजनेताओं की अहम भूमिका है ।क्योंकि दिल्ली की सता पर कांग्रेस जैसी भ्रष्‍ठ पार्टी का अधिकार जो है हाल में सी एन जी के दाम बढाने भी कहीं न कहीं कांग्रेस की नकामी का ढोल बजा रहीं है और अर्थ गणित का अभाव दिखा रहीं है जो कांग्रेस को गहरी गुमनाम खाई में ढकेल देगी और प्रमुख का टेग हटा कर अन्य के श्रेणी में लाकर खडी कर देगी जो इस पार्टी की दशा और दिशा दोनो को नुकसान पंहुचाने के लिए काफी है और इस जदोजहद में केजरीवाल की की पार्टी देष कि चाहित पार्टी बनकर उभर के सामने आयी है और केजरीवाल ने एक वक्त्वय में कहा था कि ‘‘यदि कांग्रेस राष्‍ट्र हित में काम करती तो मैं कभी अपनी पार्टी का निर्माण नहीं करता क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने आमजन को विकास के नाम पर ठगा है और विकास खाने को नहीं देता, जब देश की जनता के पेट नहीं भरेंगें तो विकास का क्या औचित्य रह जाएगा इसलिए पहले जनता के बारे में सोचे फिर विकास की बाते करे तो ठीक है’’ लेकिन काग्रेस ने सारी हदों को पार करते हुए अपने गलत बयानगी और अपने रूखे स्वाभाव को जारी रखा जिसके लाभ सीधे केजरीवाल की पार्टी को हुआ जो दिल्ली विधान सभा के चुनावों में 28 सीटों के भारी बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही लेकिन इसमें भी कांग्रेस ने की रणनीत को सभी समझ रहें है कि काग्रेस किस ओर चल रहीं है इसी चुनाव में भाजपा 32 सीटों के साथ जीती लेकिन कांग्रेस ने भाजपा को समर्थन न देकर केजरीवाल की अनुभवहीन पार्टी का को देष के दिल कहे जाने वाली दिल्ली की सत्ता का सरताज बना दिया और केजरीवाल की पार्टी को अल्टीमेटम भी दे दिया कि आपके पास 6 माह का समय है जितना बदलाव आप की पार्टी जनता में कर सकती है तो करे लेकिन केजरीवाल ने साफ करते हुए उनके इस समर्थन पर जनता की राय मांगी की जनता क्या कहती है कि सत्ता में कांग्रेस समर्थन के साथ सरकार का निर्माण करना चाहिए या नहीं, 75% जनता ने केजरीवाल की पार्टी आप के समर्थन में वोट दिया और अपनी सरकार बनाने का फेसला किया और कांग्रेस के समर्थक,विधायको को अल्टीमेंटम देते हुए 28 दिसम्बर को रामलीला मैदान में दिल्ली की जनता के समक्ष शपथ ली।

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