Tuesday, 1 September 2015

संस्कृति और सौंदर्य का तानाबाना है ‘‘ हिमाचल प्रदेश’’

उत्तर-पश्चिम भारत में स्थिति हिमाचल प्रदेश भौगोलिक दृष्टि से उन्नत और प्रगतिशील है यहां के पहाड़, धाराएं, नदियां, झरने और तो और यहां का परिवेश-सांस्कृति मन भावन है जो किसी को भी अपने ही मद में बहा ले जाए , ऊँची-ऊँची भौगोलिक दृष्टिगत पहाडिय़ां मानों सुंदरता की शाल उड़े कह रही हो कि च्च्मैं यहां रची बसी हूं आकर मेरे अदम्य् सौंदर्य का नजारा लोज्ज्,
    निर्मल बहती पावक धाराएं, कल-कल करती हुई मन को मोह लेती है यहां के परिवेश में मधुर संगीत का बिगुल घोल कर अपनी ओर खींचती है और चित् खिचा चला जाता है इन मधुर सुर लहरियों को सुनने को अतुर हो । पक्षियों के कलरव, रंग-रूप और प्रकृति यौवन से प्रेरित हो अपने आप में अदम्य् उत्साह से भरा हुआ महसूस करता है, जो उसको कही ओर नहीं मिला वो उसे इन हिमाचल की पर्वत श्रंखलाओं की गोद में मिलता सा प्रतीत होता है जिसको वह अन्नत काल तक जीवित होकर भी ढूंढ नहीं पता, हिमाचल में कलरव करते जीव, जन्तु, पक्षी अपने अदम्य् सौदर्य और उच्च स्वर के वाहक बन अन्तर आत्मा में अपनी सौदर्यता से पूर्ण, स्वर लहरियों को हृदय में उतार देते हैं जो आनन्द से भरी होती है 
       कल-कल करती धराओं के किनारे बैठ, सुरताल की कला से निपूर्ण प्राकृति मानों बेजना बजा कर सारे दुखों को मोह लेती है और अद्म्य संगीत रगों में घोल देती है जिसको छोडक़र कहीं जाने का मन ही नहीं होता और मानों मन इसका विहीन हो गया हो और उत्साह से परिपूर्ण हो धाराओं के संगीत में मग्न होकर खो जाता है अति सौदर्य लेकर आई ताल, हृदय को छू जाती है और अदम्य् संगीतमय शांति में चित, हृदय और मतिष्क को अपनी कल-कल करती निर्मल धाराओं में बहा ले जाती है । जो दुख के क्षणों में भी कोमल हृदय व मन को शांति का अनुभव करा कर मन को रंजित कर , अदम्य् उत्साह जगाती हैं जिस स्वर लहरी को हर जीव ढूंढता है उसका वास हिमालय की ममतामयी गोद में होता है 
संस्कृति यहां के सूरों की वाहक हैं जो मन को स्वयं की ओर बहा ले जाती है । परिधान और निर्माण की गाथा, अथाह गायन करती हुई अपनी संस्कृति को कृतक करती हैं मानो कुछ संदेश देती प्रतीत होती है जो मस्तिष्क बिन्दू में उतर कर भी उतर नहीं पाती और सोैदर्य से लबालब होकर अपने परिदृश्य में सब कुछ समेट लेती है चाहे वो च्सुरज् हो या कोई च्नाटीज् । मानो ये दृष्टि और कर्ण हों जिसके द्वारा ये अपना वैभव देख व सुन-सुनाने में परिपूर्ण हो ।
 अपने सौंदर्य और सांस्कृति के लिए जाने-माने लोकगीतों में यहां, सांस्कृति की झलकियां स्पष्टत: विविध कार्यक्रमों में मिल जाती है जो हिमाचल पर्वत मालाओं को तो सराभोर करती है ही, अपितु गायन सांस्कृतिक मापदंडों पर खरी भी उतरती है जिनमें हिमाचल के साधारण परिवेश, साज़-सज्जा और रहन-सहन को भांलि- भांति अभिनय के माध्यम से सपूर्ण भारत में प्रख्यात करती है जिसको  देखने और सुनने के लिए व्यक्ति आतुर हो उठता है ओर अद्म्य प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक का तानाबाना बुनता है, 
हिमाचल का परिवेश जितना आसाधारण है उतना ही यहां का रहन-सहन साधारण है यहां के पुशाक पुस्तैनी होने के साथ विश्व प्रख्यात भी हैं, जिन्हें धारण करना यहां वैभव का प्रतीक माना जाता है, और कुल देवता पूजन में आम जन पोशाक को धारण करता है, यही एक कारण है प्राकृति सौदर्य और सांस्कृति वैभव के माध्यम से चित् को हर्षोउल्लास प्रदान करने का इसी वैभव की बुनियादी तहरीर और सांस्कृति , प्राकृतिक अद्म्य सौदर्य से संतुष्टि प्राप्त करने पर्यटक इस ओर खिचे चले आते हैं प्राकृतिक आन्नद हेतु  लोभ-लुलापसा और अतगामी जीवनचर्या से दूर हिमाचल की ममतामयी गोद में । 
                                                                                       प्रस्तुति- सोहन सिंह

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