Friday, 16 October 2015

आरक्षण खत्‍म करना राजनीतिकरण का हिस्‍सा

कुछ बडे समाचार पत्रों मे आरक्षण को लेकर हो रही बहस में कहीं आरक्षण काे बचाने का मुददा नहीं दिखाई दे रहा है बल्कि आरक्षण खत्‍म करने का मुददा दिखाइ दे रहा है और बडे-बडे नामी-ग्रमी लेखक बडे-बडें समाचार पत्रों के लिए लिख रहें हैें कि आरक्षण बंद होंना चाहिए । मुझे तो लगता है आरक्षण की जगह उन्‍हें ब्ंद होना चााहिए जो अरक्षण विरोधी बीजेपी का साथ दे रहे हैं जो अपनी बडी हेंडिगों में आरक्षण को मिटाने की बात कहने से भी गूरेज नहीे कर रहे है लगता यों है कि ये लेखक कहीं न कहीें बीजेपी के चटे बटे हैं जो बीजेपी के कहने पर आरक्षण मिटाने की बात कर रहें है लेकिन इन्‍हें शायद निम्‍न जाति वालों कि परिस्थितियों के बारे में पता नही क्‍यों कि ये कभी गांव देहात मे नहीं गए इन्‍हें अपने बडे-बडे आलीशान बंगलों में बैठ कर आरक्षण की बात करने के पैसे मिल रहे हैं जो आरक्षण की बात को लेकर इतनी चिंतित है जितने कभी न हुए होंगे
लेकिन इन्‍हें निम्‍न जाति वालों को मिल रहे आरक्षण को देख बहुत जलन हो रही है इन्‍हें शायद ये तक पता नहीं कि आज भी गांव देहात में 70 प्रतिशत लोग निम्‍न वर्ग से हैं जिन्‍हें आज भी अपने मंदिरों, घरों और पास तक नहीं बैठने दिया जाता है और शिक्षा लेने की बात तो दूर तक दिखाई ही नहीं देती आज भी 30 प्रतिशत लेाग 70 प्रतिशत लोगों पर काबिज है फिर भी उन्‍हीं की तरफदारी आज की मीडिया और सरकार कर रही है आरक्षण्‍ा हटाने की बात कह कर ।
वो नौकरियों में आरक्षण की बात कहते है लेकिन आरक्षित नौकरियों आरक्षित बर्ग को नहीं मिलती बल्कि उनकी नौकरियों पर उच्‍च वर्ग कुडली मार लेता है क्‍योंकि अधिकतर ऑफिस और संस्‍थाओं मे उंच्‍ची पोस्‍टों पर उंच वर्ग के लोग काबिज है जो अपने आगे आरक्षित वर्ग की श्रेणी से आये व्‍यक्ति को काम नहीं करने देते और उसका निरंतर दमन करते है जो बहुत निदनीय है यदि ऐसे में आरक्षण खत्‍म कर दिया जाए तो जो निम्‍न बर्ग के लोग है उन्‍हें नाैकरी तो दूर उन्‍हें उच्‍च्‍ा वर्ग , उंच्‍च शिक्षा के काबिल भी नहीं समझेगा औरर इतिहास फिर दाेबारा दोहराया जायेगो जो कभी महात्‍मा फूले और डा भीम राव अम्‍बेडकर ने मिटाने की कोशिश की थाी आरक्षण खत्‍म होतेे ही वहीं दिन फिर से लौट आयेंगे जो कभी निम्‍न वर्ग के लोगों ने भुगते थे ।

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