Friday, 11 May 2018

दो विकल्प होने के बाद भी तीसरा विकल्प क्या ?

तार्किकता के मापदंड पर खबरों का आकलन करें तो कोई भी राजनैतिक खबर सही मायनों में सही नही लगती क्योंकि राजनेताओं के वादों में बहुत ही खिलाफत दिखती है वादे और वाद में उनके बहुत ही निरंतरता है जिसमें नए नेता हों या गुड़ी नेता सब नजदीक आकर, एक जैसे ही प्रतीत होते हैं जिसमें समाज ही पीसता है लेकिन नेता अपनी साख हम लोगों के द्वारा ही बनता है और हमें सालों साल मूढ़ बनाता है जिसका खामियाजा हम एक दूसरे के खिलाफ ही आजमाते हैं। जो हमारी मूर्खता और अज्ञानता को ही परोसती है जिसमें हम रहना नहीं चाहते लेकिन उसमें रहते हैं जिसे हम अपनी अज्ञानता कहें या राजनेताआंे की बुद्विमता कहें लेकिन कुछ भी हो पीसता तो आम आदमी ही है जो रहते हुए भी न के बराबर है।
यदि हम तार्किकता से सुसंगत हों तो प्रश्न यहां यह आता है कि तीसरा विकल्प क्या है लेकिन तीसरा विकल्प ही हमंे मूर्ख बना जाए तो कोई चैथा विकल्प भी बचता है इस प्रश्न का उत्तर ‘न’ में ही समाने आता है जो कोई विकल्प ही नही बन सकता। इसलिए दो ही सुसंगत प्रतीत होते है बावजूद इसके की हम किस को ज्यादा पंसद करें। यदि हमें किसी को लंबा समय दे दें तो उसकी कार्यप्रणाली, कार्य क्रिया को समझने में सलयता रहती है जिसका आकलंन हमें कुछ वर्षो बाद या कुछ समय बाद ही पता चल जाता है जो उसकी कार्य क्षमता का अंक प्रमाण पत्र हो सकता है लकिन इसके बाबजूद भी हमें उसको ही क्यों पंसद करते हैं जो परीक्षा में असफल हुआ है। 
भारतीय राजनीति इसका एक सक्षम उदाहरण है जिसके अंतःमन में 1947 से कांग्रेस ही छीपी थी। जिसने कुछ मुद्दों पर तो मोर्चा मारा है लेकिन कई मोर्चाे पर वह विफल भी रही है वह मोर्चे भारत के जी का जंजाल बने हुए हैं। जिनको कामोवेश उस समय की राजनीती ने हल नहीं होने दिये जो अब नासूर हो रहे है जिसमें सबसे बड़ा उदाहरण कश्मीर है जिसके चलते वर्तमान में भारत उबल रहा है बरसों से चली आ रही लड़ाई अब तक थमी नही। वहां से हिन्दूवासियों को खदेड़ा गया तब मोर्चे नहीं खुले, लेकिन अब मोर्चे खुले हैं जब कुछ नेता पाकिस्तान का गुणगान करते हैं जिन्हें भारत से राजनीति में आन्नद आता है लेकिन हमारी सरकारो की इच्छा शक्ति यहां दिखाई नहीं देती अगर दिखाई देती भी है तो विपक्ष अघोषित विलाप छेड़ देता है जो सेना की कार्यवाही में छिंटाकशी का कार्य करती है जिसका हल शायद ही कभी आ पाए।
ये तो मात्र एक ही उदारण है ऐसे कई उदाहरण है जो भारतीय राजनीति की कलई खोलने के लिए ही जन्में हैं जिनमें एक उदाहरण दिल्ली का भी है जिसमेे ‘‘आम आदमी की पार्टी’’ कही जाने वाले राजनैतिक दल को जन्म दिया। जिसने पिछले कुछ वर्षों में सभी को भ्रमित किया है जिसकी कार्यशैली निष्पकक्ष नहीं है जो ‘‘कहती कुछ और है करती कुछ है’’ यह वही विकल्प था जिसकी मैंने दूसरी प्रस्तावना में बात की है जिसको तीसरा विकल्प समझ कर दिल्ली की जनता ने पलकों पर बिठाया। लेकिन इस विकल्प ने ही जनता को ठगा ये कहकर की ‘‘हम सबसे अच्छे हैं बाकि सब चोर’’ हैं। लेकिन सही मायनों में चोर-चोर मौसेरे भाई होते हैं यह कहावत यहां आम आदमी पार्टी ने पुख्ता कर दी। जिसने गत् 4 वर्षों में दिल्ली के विकास को 5 वर्ष पीछे धकेला है जो निरंतर लड़ाई-झगड़ों में व्यस्त रही है कभी राज्यपाल के साथ तो कभी प्रशासनिक अधिकारियों के साथ, दिल्ली के आम नागरिक को भुगतना पड़ा। लेकिन इसमें सारी गलती इनकी भी नहीं कह सकते यहां कांग्रेस, भाजपा का मुद्दा भी उछल कर आंखों के समीप है। जिसको न चाहते हुए भी छिपाया नहीं जा सकता। ये वही पार्टियां हैं जिन्होने इन आकूतों को सत्ता में आने का मौका दिया जो पहले से ही भूख से बिलक रहंे थे
- सोहन सिंह 

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