वर्तमान में जी रहे हैं हम लोग या जी रहे हैं भूतकाल में, ये मैं इसलिए कह रहा हुं कि हम कौन सी दुनिया में जी रहे हैं ा आज पूरा विश्व नए-नए किर्तीमान स्थापित कर रहा है और हम भारतीय सिर्फ पूराने रीति-रिवाज और धर्म और जाति को ढो रहे है, हम उस पत्थर को पूज रहे है जो जडमत है ओर उसका हमारे समाज में इतना सम्मान, जो जीवित है भूख-प्यास से मरा जा रहा है उसकेा हम देखना भी नहीं चाहते ा जाति धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर हम आपस में बट रहे है आखिर कौन सी दुनियां में जी रहे हैं
निरजीवों पर तो तमाम पैसा खर्च कर रहें है लेकिन सजीव जो टकटकी लगाकर बैठे है उनको देख भी नहीं सकते हम, जो दो जून की रोटी के लिए हमेशा से मेहनत करता आ रहा है उसकी उस रोटी को छीनने के लिए हमेशा तैयार हैं हम, जिन बच्चों को पढना चाहिए उनसे उनकी पढाई का हक छीन रहे है हम, आखिर किस दुनियां में जी रहे है हम,बातें तो बहुत करते है कि हम अपने सामज के लिए यें करेगे वो करेगे लेकिन जात पूंछ कर हम, कर क्या रहें हैं ये ा
ये समझना होगा हमें, उस जीवित प्राणी के बारे में, जो रोज मेहनत करता है ओर दो वक्त की रोटी का आशय ढूढता है, लाला-बनिया पहले हक मारा करते थे, लेकिन आज सब के सब भूखे बैठे हैं उनका हक मारने के लिए, ये कहां कि इंसानियत है, कभी उनको जाति में तुलते है तो कभी उनकी मजबूरी से, पर बात करते हम बराबरी की हैं ा हमसे तो बढिया वो जानवर है जो बोल नहीं सकता, तो वो तोल भी नहीं सकता ालेकिन हम तो उस जानवर से भी नीचे गिर गए हैं और कहते है कि हमसे विद्ववान कोई नहीं, आखिर ये कैसे विद्ववान हैं हम, जो समाज को बराबरी की नजर से भी देखना पंसद नहीं करते, और दुनिया बदलने का दंभ भरते नहीं थकते हैं हम
निरजीवों पर तो तमाम पैसा खर्च कर रहें है लेकिन सजीव जो टकटकी लगाकर बैठे है उनको देख भी नहीं सकते हम, जो दो जून की रोटी के लिए हमेशा से मेहनत करता आ रहा है उसकी उस रोटी को छीनने के लिए हमेशा तैयार हैं हम, जिन बच्चों को पढना चाहिए उनसे उनकी पढाई का हक छीन रहे है हम, आखिर किस दुनियां में जी रहे है हम,बातें तो बहुत करते है कि हम अपने सामज के लिए यें करेगे वो करेगे लेकिन जात पूंछ कर हम, कर क्या रहें हैं ये ा
ये समझना होगा हमें, उस जीवित प्राणी के बारे में, जो रोज मेहनत करता है ओर दो वक्त की रोटी का आशय ढूढता है, लाला-बनिया पहले हक मारा करते थे, लेकिन आज सब के सब भूखे बैठे हैं उनका हक मारने के लिए, ये कहां कि इंसानियत है, कभी उनको जाति में तुलते है तो कभी उनकी मजबूरी से, पर बात करते हम बराबरी की हैं ा हमसे तो बढिया वो जानवर है जो बोल नहीं सकता, तो वो तोल भी नहीं सकता ालेकिन हम तो उस जानवर से भी नीचे गिर गए हैं और कहते है कि हमसे विद्ववान कोई नहीं, आखिर ये कैसे विद्ववान हैं हम, जो समाज को बराबरी की नजर से भी देखना पंसद नहीं करते, और दुनिया बदलने का दंभ भरते नहीं थकते हैं हम
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