भारतीय समाज के अतंर्गत दलित-पिछडा वर्ग बहुसंख्यक है लेकिन यह अभी भी अनेक प्रकार से दमित और शोषित है।
18 वी शताब्दी में दलितों के लिये आवाज उठाने वाले नेता पैदा हुए जो स्वंय भी दलित समाज के थे और उन्होने ये प्रताड़ना झेली थी, 18 वीं शताब्दी के क्रांतिकारी सामाजिक चिंतक नेता ज्योतिबाफूले और बाद में डा भीमराव अम्बेडकर जी के नाम सामने आए। इन्हीं समाज सुधारकों के कारण ही आरक्षण शब्द को आजादी के बाद भारत में जगह मिली, जो वर्तमान में दलित-पिछडों के अधिकारों का पर्याय बन गया है जिसका सीधा लाभ दलित-ओबीसी समाज को हुआ।
1882 में हंटर आयोग की नियुक्ति हुई जिसमें महात्मा ज्योतिराबा फूले ने नि:शुल्क शिक्षा के साथ नौकरियों में भी आरक्षण की मांग की। उनकी इस मांग से राजनैतिक हलचल पैदा हुई और आरक्षण की मांग जोर पकड़ने लगी,क्योंकि अब सब को बराबरी का दर्जा देने का समय आ गया था।
1979 में शैक्षणिक और समाजिक रूप से पिछड़े दलित समुदायों का मूल्यांकन किया गया किन्तु इस वर्ग का सटीक आंकड़ा उनके पास था जिसमें 52 प्रतिशत आबादी का मूल्याकन 1930 की जनगणना के आकडों में किया गया। 1980 में एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें मौजूदा कोटा बदलकर 22 प्रतिशत से 49 प्रतिशत कर दिया गया
12 अगस्त 2005 उच्चतम न्यायलय ने पीए इमानदार और अन्य के मामले में 12 अगस्त 2005 को 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए घोषित किया कि पेशावर राज्यों के कालेजों समेत सहायता प्राप्त कालेजों में अपनी आरक्षण नीति को गैर अल्पसंख्यक और अल्पसंख्यकों पर नहीं थोप सकते । 2005 में निजी शिक्षण संस्थानो में पिछड़े वर्गो और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण अनिर्वाय कर दिया और 93 वां सवैधानिक संशोधन लाया गया जो 2005 में उच्च न्यायलय ने प्रभावी रूप से उलट दिया। 2006 में केन्द्रिय सरकार ने उच्च शैक्षणिक संस्थानो में पिछड़े वर्गो के लिये आरक्षण अनिवार्य कर दिया।
केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानो में उपलब्ध सीटों में से 22.5 प्रतिशत अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है जिनमें से 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति (दलित) के लिए ओर 7.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों (आदिवासी) के लिए आरक्षित की गई है इसके अलावा 27 प्रतिशत सीटे ओबीसी के छात्रों के लिए है जिनका कुल योग 49.5 फीसदी है।
कुल मिलाकर दलित व दबे समुदायों को आगे लाने में आरक्षण का विशेष महत्व है।
(Forward press Magazine)
18 वी शताब्दी में दलितों के लिये आवाज उठाने वाले नेता पैदा हुए जो स्वंय भी दलित समाज के थे और उन्होने ये प्रताड़ना झेली थी, 18 वीं शताब्दी के क्रांतिकारी सामाजिक चिंतक नेता ज्योतिबाफूले और बाद में डा भीमराव अम्बेडकर जी के नाम सामने आए। इन्हीं समाज सुधारकों के कारण ही आरक्षण शब्द को आजादी के बाद भारत में जगह मिली, जो वर्तमान में दलित-पिछडों के अधिकारों का पर्याय बन गया है जिसका सीधा लाभ दलित-ओबीसी समाज को हुआ।
1882 में हंटर आयोग की नियुक्ति हुई जिसमें महात्मा ज्योतिराबा फूले ने नि:शुल्क शिक्षा के साथ नौकरियों में भी आरक्षण की मांग की। उनकी इस मांग से राजनैतिक हलचल पैदा हुई और आरक्षण की मांग जोर पकड़ने लगी,क्योंकि अब सब को बराबरी का दर्जा देने का समय आ गया था।
1979 में शैक्षणिक और समाजिक रूप से पिछड़े दलित समुदायों का मूल्यांकन किया गया किन्तु इस वर्ग का सटीक आंकड़ा उनके पास था जिसमें 52 प्रतिशत आबादी का मूल्याकन 1930 की जनगणना के आकडों में किया गया। 1980 में एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें मौजूदा कोटा बदलकर 22 प्रतिशत से 49 प्रतिशत कर दिया गया
12 अगस्त 2005 उच्चतम न्यायलय ने पीए इमानदार और अन्य के मामले में 12 अगस्त 2005 को 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए घोषित किया कि पेशावर राज्यों के कालेजों समेत सहायता प्राप्त कालेजों में अपनी आरक्षण नीति को गैर अल्पसंख्यक और अल्पसंख्यकों पर नहीं थोप सकते । 2005 में निजी शिक्षण संस्थानो में पिछड़े वर्गो और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण अनिर्वाय कर दिया और 93 वां सवैधानिक संशोधन लाया गया जो 2005 में उच्च न्यायलय ने प्रभावी रूप से उलट दिया। 2006 में केन्द्रिय सरकार ने उच्च शैक्षणिक संस्थानो में पिछड़े वर्गो के लिये आरक्षण अनिवार्य कर दिया।
केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानो में उपलब्ध सीटों में से 22.5 प्रतिशत अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है जिनमें से 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति (दलित) के लिए ओर 7.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों (आदिवासी) के लिए आरक्षित की गई है इसके अलावा 27 प्रतिशत सीटे ओबीसी के छात्रों के लिए है जिनका कुल योग 49.5 फीसदी है।
कुल मिलाकर दलित व दबे समुदायों को आगे लाने में आरक्षण का विशेष महत्व है।
(Forward press Magazine)
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