Wednesday, 8 May 2013

बेडियां


हम इंसान उन दूसरे जीवों से हटके, एक अलग ही कैटगीरी में आ जाते हैं सिर्फ अपने सोचने की और बोलने की शक्ति के कारण, क्‍योकि इस प्रक्रिती ने हमें हर वो चीज दी है जो ओर दूसरे जीवों से हमारी तुलना को अधिक महत्‍व वाली बना देती है लेकिन हम अपने इस सोचने ओर बोलने की इस अद्भभूत शक्ति का प्रयोग मात्र अपने हित हेतू करने का प्रयास करते हैं जो हमें हमारे समाज में हमें ही अलग कैटगीरी में खडा कर देता है जिसके कारण हम अपने जैसे दूसरे जीव के साथ सौतेला व्‍यवहार करना शरू कर देते है ये सिर्फ हम ओरों से आगे निकलने की होड में करते हैं कि हम अपने जैसे जीवों में सबसे आगे रहें ओर उसको अपने से आगे निकलने का मौका तक न दें, इन सबका संबंध हम कहीं न कहीं अपने उन पुराने ग्रथेां से जोड्र कर देखते है जो कि आज हमारी इस दशा के उत्‍तदायी है और उस मनुवादी व्‍यवस्‍था से ग्रसित हैं जिनका प्रभाव वर्तमान में हमें देखने को कहीं न कही तो मिल ही जाता है वो इस मनुवादी विचार धारा कि ही देन है  ि‍जिसके कारण हम  अलग थलग जातियों मे ब्ंट गए हैं ये मात्र स्‍वार्थ साधने हेतु बनाई व्‍यवस्‍था थी जिसको बढावा हम जैसे ही मानवों ने दिया जिसके कारण हमने वर्णो को बनाया जिसमें कुछ स्‍वार्थी लोगों ने व्‍यवसाय को आधार बना कर जाति का निर्माण किया और शुरू कर दिया वो घिनौना क्रत्‍य जिसमें ये मानव रूपी जीव बहना शुरू हो गया ओर अपनी इस कंलक कारणी व्‍यवस्‍था को आमली जामा पहनाना शुरू कर दिया और इसके बाद उन दुयम दर्जे के मानवो के साथ अभ्रद व्‍यवहार, पशुओं की तरह उन्‍हें रखना ओर उनको गंदे संदे बर्तनों में खाना देना ओर, उनकी अभिव्‍यक्ति को दबाना और उस इश्‍वर से दूर रखना जिसका नाम ले कर परम सुख् पा सके, उस  अभिव्‍यक्ति तक को झीन लिया,जो व्‍यवस्‍था समाज के पतन का कारण बनी ओर जिसके कारण हमने दुसरों तक को अपना ताज दे दिया और उन्‍हें राजा बना कर खुद पर राज करवाया ा जिसका फायदा उन हुकमरानों ने लगभग 800 वर्षो तक उठाया ा ओर हमें ये याद नहीं आने दिया कि हम भारत देश के मूलनिवासी है और हम उन विदेशियों को अपना हुकमरान समझने लगे थे लेकिन इस बीच ऐसे भी लोगों का जन्‍म हुआ जो इस व्‍यवस्‍था को बदलने के लिए  अपना सर्वस्‍व तक दाव पर लगा दिया, लेकिन बात वहीं की वहीं थी  इस वर्ण व्‍यवस्‍था से कैसे निकला जाए इस वर्ण व्‍यवस्‍था से निजात दिलाने के लिए  दुयम जाति में महामानवों का जन्‍म हुआ जिन्‍होने इस व्‍यवस्‍था को बदलने का भरसक प्रयास किया ा लेकिन इस व्‍यवस्‍था ने पैर जमा रखे थे ा उन महान पुरूषों के बलिदान के कारण हम अपना असमान देख पाए ओर 26 जनवरी 1947 को हमें आजादी मिली ा लेकिन जिस व्‍यवस्‍था के कारण हम 800 वर्षो तक दूसरो को अपना मालिक मानते रहें वो व्‍यवस्‍था आज वर्तमान में भी पैर पसारे अपना काम दर काम निकाल रही है, इतने बलिदानों के बाद भी इस व्‍यवस्‍था का बलिदान नहीं हो पाया  ा ये मनुवादी व्‍यवस्‍था आज भी जीवित है  जब तक हम इस मनुवादी व्‍यवस्‍था को नहीं बदलेगें तब तक हम इन गुलामी की बेडियों को नहीं तोड पाएगे

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