Tuesday, 21 May 2013

देश का भविष्‍य सडको पर,


देश का भविष्‍य सडको पर,देखों कैसे रहा है फिर  
मासौमियत भरी आंखों से मांग रहा फिर अपना हक
खाने को रोटी दो रहने को दो मकान
पढने को किताबें दो खेलने को दो मैदान
एक आशियाना ऐसा दो जिसमें रह सके हम मेहफूस
न हम फिर फिरें हाथ में लटका कर कूडे का बोरा
मन में बोझ यहीं है हमारे 
कि हम भी होते किसी के दुलारे
एक अशियान ऐसा दो हमें 
जिसमें मां बाप हों हमारे
बडे भाई का मिले दुलार
और छोटे भाई को करे हम भी प्‍यार
लेकिन हॉय हमारी किस्‍मत
जिसने पैदा किया छोड उसी ने दिया 
अब न मिलेगे वो दोबारा
शायद हमारी किस्‍मत को है यही गवारा
बस अब इस झूठी सरकार से 
हमें क्‍या मिलेगा सहारा 
मासौम हमारी आंखे कर रही हैं इंतजार
कोई हो हमारा जिसका हम  मासौमों को हो सहारा
हॉय हमारी किस्‍मत जिसको नहीं मिल पा रहा 
अभी भी कोई किनारा
हम  भटक रहे हैं हाथों में अब भी लेकर बोरा 
 हॉय हमारी किस्‍मत,हॉय हमारी किस्‍मत
हॉय हमारी किस्‍मत

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