दलित शब्द सच्ची कहानियों का संग्रह है जो इस समाज की सच्ची कुठांओं, आडम्बरों को अपने में इस तरह पिरोए हुए है जैसे ‘‘धागों में मोतियों की लड़ी’’ ।
जो भारत वंष को कटोचता सा प्रतीत होता है इसकी उन तमाम गतिविधियों को रोकता प्रतीत होता है जो इस समाज की उन्नति और प्रगति के बीच का पत्थर हमेषा से ही बनता आया है इस भारत वर्श में दलित शब्द का अपना इतिहास रहा है जो भारत के धर्म की हमेशा से ही पोल खेालता नज़र आता है इस धर्म के आड़े आकर ही तो पंडाओं ने अपनी स्वार्थ सीधी को साधा है और जातियों में हमारे खुषहाल भारत को बांट दिया जो वर्तमान में हमारी खुषहाली में ग्रहण लगा कर मानों की हमें चिड़ा रहा हो और कह रहा हो कि मैं ही वो राक्षस हूं जो तुम्हारी सुख शंति छीन
लुंगा । जो वर्तमान में उस सत्य को उज़ागर कर रहा है जो वर्ण सगंठित किए गए थे पंरतु आज वर्तमान भी उन्हें ढो रहा है
दलित शब्द ही वो विज्ञान है जिसने इस विष्व का सर्वप्रथम वैज्ञानिक पैदा किया और जरूरत मंदों को उनकी जरूरतों के हिसाब से मषीनरी को संग्रहित किया और उन चीजों का इस्तमाल भी जनता को सीखाया । पंरतु उस वैज्ञानिक को हीन भरी नज़रो से इस मनुवादियों ने देखा जिसका परिणाम रहा वर्णों की व्यवस्था । वर्णों की व्यवस्था से व्सथित सबसे पहला समाज,शुद्र समाज रहा जो वर्तमान में दलित शब्द से जाना जाता है
यही वो समाज है जो भारत वंष का मूल अधिकारी है जो अपने आप में एक सर्वगुण और सम्पन्न समाज है जो दूसरों के कार्यों को भी बढ़ी निर्भिगिता से निभाता है लेकिन यही समाज उपेक्षित होता है कहीं षिक्षा से तो कहीं अपने उन मूल अघिकारों से जिनका वो जन्म से ही अघिकारी है और उनके लिए वो इन मनोवादियों से हमेषा से लड़ता रहा है लेकिन मनुओं ने उसे ही इस समाज से बाहर कर दिया। इनके इतिहास को देखें तो इनके विरूद्व तमाम ऐसी कुरितियां पैदा कर दी गई जिनको वो आज ढो रहा है
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