Saturday, 4 May 2013

नन्‍ही सी कली

नन्‍हीं उगलियां, नन्‍हें पैर और छोटी सी काया की धनी तू बनी मेरे घर की लक्ष्‍मी, पर कहां था पत्‍ता मुझे की ये जालिम समाज तुझे बढा होते देख, तनी हुई नजरों से करेगा वार, ऐसे समाज से तुझे मैं कैसे बचाओं कि तेरे उपर किसी की नजर न जा पाए कैसे इस समाज के दरिदों से तेरी रक्षा करूं कि तू मुझे सम्‍मान की नजरों से देखे कैसे तू ही बता कैसे ा 



   ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हर बाप के जहन में आकर उसकी रूह तक को कंपा देते हैं, इस समाज के उन गिद्ध चाल दरिदों की करतूतों को देख कर ओर सुनकर, हर बाप के दिल में ये सवाल आता है कि क्‍या लड्की को इस समाज की घोरती नजंरो से कैसे बचाओं ा 

      यही कुछ सवाल आज की हर उस नारी के अंदर डर व भय का कारण बन कर उनके नारीत्‍व को  
      अंदर ही अंदर झकझोर देता है कि यदि हम नारी  है तो इसमें हम क्‍यों दबे,आज नारी के उस अधिकार की सब मांग करते हैं जो उसका जन्‍म सिद्ध अधिकार है लेकिन उस ही नारी के साथ ऐसी दरिदंगी का, ये ममता से भरी प्रियागणी क्‍या मतलब निकालें, जो लोग कहते हैं कि  हम नारी के लिए अपनी जान तक लगा देगें वे ही उन को उस नजरों से देखते हैं जैसे कि वही सारी कायनात के मालिक हों ओर बातों के पुलिदों से अपने उस मकसद को पा लेते है जिनका नारी समाज आ्रग्रणी बनता है 
    अब यहां सवाल ये उठता है कि नारी समाज को जो सुरक्षित करने का दावा करता है वो ही उसका शोषक है तो ये नारी समाज कहां जाए, ये कुछ ऐसे प्रश्‍न है जिनका जबाव इस सरकार पर भी नहीं हैं  
    
तो इसका जबाव किस पर है अगर किसी के पास इसका जबाव हो तो मुझे बताइए ा

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